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उत्तराखंड के 20 प्रमुख दर्शनीय शिव मंदिर हिंदी में

उत्तराखंड के 20 प्रमुख दर्शनीय शिव मंदिर हिंदी में – Top 20 Shiva Temples in Uttarakhand in Hindi

उत्तराखंड सदियों पुराने मंदिरों की भूमि है, और उत्तराखंड में शिव मंदिर बहुत प्रसिद्ध हैं। इन मंदिरों में भगवान शिव की कई दिव्य रूपों में पूजा की जाती है। उत्तराखंड में शिव मंदिर इतने प्रसिद्ध हैं कि पौराणिक किंवदंतियां हैं जिनका उल्लेख हिंदू पुराणों और वेदों में मिलता है। उत्तराखंड में प्रसिद्ध शिव मंदिर पूरे उत्तराखंड राज्य में फैले हुए हैं और ये मंदिर आपको उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में मिल जाएंगे। आप उत्तराखंड के इन प्रसिद्ध शिव मंदिरों में किसी भी समय जा सकते हैं।

1. केदारनाथ मंदिर – Kedarnath Temple

 Top 20 Shiva Temples in Uttarakhand in Hindi

केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड का सबसे प्रसिद्ध शिव मंदिर है। यह भारत के 12 ज्योतिर्लिंग मंदिरों में सबसे प्रसिद्ध है। आप उत्तराखंड पंच केदार यात्रा और उत्तराखंड चार धाम यात्रा पैकेज के हिस्से के रूप में केदारनाथ मंदिर जा सकते हैं। केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर के काफी पास मंदाकिनी नदी बहती है। हिंदू पौराणिक कथाएं बताती हैं कि पांडवों ने इस मूल मंदिर का निर्माण कराया था। सर्दियों के दिनों में, इस मंदिर से मूर्तियों को ऊखीमठ ले जाया जाता है।

2. तुंगनाथ मंदिर – Tungnath Temple

 Top 20 Shiva Temples in Uttarakhand in Hindi

तुंगनाथ मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है और यह उत्तराखंड के प्रसिद्ध शिव मंदिरों में से एक है। यह उत्तराखंड के पंच केदार मंदिरों में से एक है। तुंगनाथ मंदिर इतना प्रसिद्ध है कि तुंगनाथ ट्रेक उत्तराखंड में सबसे अच्छे ट्रेक में से एक है। तुंगनाथ मंदिर से नंदा देवी, चौखम्बा, बंदरपूंछ, पंचचुली और त्रिशूल की हिमालय की मनोरम पर्वत चोटियाँ शानदार दिखती हैं। दूसरी ओर, आप गढ़वाल क्षेत्र की घाटियों को देख सकते हैं।

3. मध्यमहेश्वर मंदिर – Madhyamaheshwar Temple

 Top 20 Shiva Temples in Uttarakhand in Hindi

मध्यमहेश्वर मंदिर को मदमहेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर में सुंदर प्राचीन वास्तुकला है। मध्यमहेश्वर मंदिर भी प्रसिद्ध पंच केदार यात्रा का हिस्सा है। हरे-भरे पहाड़, घाटियाँ और घने देवदार के जंगल मध्यमहेश्वर मंदिर को चारों तरफ से घेरते हैं जिससे यह बहुत ही मनोरम लगता है। पांडवों ने इस मूल मंदिर का निर्माण भगवान शिव से प्रार्थना करने के लिए किया था, जिनके शरीर का मध्य भाग यहां प्रकट हुआ था। आप मधमहेश्वर मंदिर से चौखम्बा और नीलकंठ की सुंदर पर्वत चोटियों को देख सकते हैं।

4. रुद्रनाथ मंदिर – Rudranath Temple

 Top 20 Shiva Temples in Uttarakhand in Hindi

उत्तराखंड में एक और प्रसिद्ध शिव मंदिर रुद्रनाथ मंदिर है। आप अपनी पंच केदार यात्रा के दौरान रुद्रनाथ मंदिर जा सकते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस स्थान पर भगवान शिव का चेहरा प्रकट हुआ था। पांडव भाइयों ने रुद्रनाथ का मूल मंदिर बनवाया था। रुद्रनाथ मंदिर में पानी की कई टंकियां हैं। नंदा घुंटी और त्रिशूल कुछ पर्वत शिखर हैं जिन्हें रुद्रनाथ मंदिर से देखा जा सकता है। रुद्रगंगा नदी मंदिर के पास बहती है जो इसे बहुत ही सुंदर बनाती है।

5. कल्पेश्वर महादेव मंदिर – Kalpeshwar Mahadev Temple

उत्तराखंड के प्रमुख शिव मंदिर

कल्पेश्वर मंदिर उत्तराखंड में प्रसिद्ध पंच केदार यात्रा का हिस्सा है। यहां भगवान शिव के बालों के ताले प्रकट हुए थे। कल्पेश्वर मंदिर सबसे सुलभ पंच केदार मंदिरों में से एक है, और यह पूरे वर्ष खुला रहता है। कल्पेश्वर मंदिर बहुत ही सुंदर उर्गम घाटी में स्थित है और कल्पेश्वर मंदिर ट्रेक उत्तराखंड के प्रसिद्ध ट्रेकिंग स्थानों में से एक है। अन्य प्रसिद्ध मंदिर जैसे ध्यान बद्री, और बुद्ध केदार कल्पेश्वर मंदिर के करीब हैं। मंदिर परिसर में एक कल्पवृक्ष वृक्ष है, जो भक्तों और तीर्थयात्रियों की मनोकामना पूर्ति के लिए प्रसिद्ध है।

6. गोपीनाथ मंदिर – Gopinath Temple

उत्तराखंड के प्रमुख शिव मंदिर

गोपीनाथ मंदिर गोपेश्वर में है, और यह उत्तराखंड में बेहद लोकप्रिय शिव मंदिरों में से एक है। यह उत्तराखंड के पंच केदार मंदिरों की तरह ही पवित्र है। गोपीनाथ मंदिर का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण भगवान शिव का त्रिशूल है, जो 8 विभिन्न धातुओं से बना है। त्रिशूल को इस तरह से बनाया गया है कि इतने सालों में उसमें जंग भी नहीं लगा है। एक स्थान पर त्रिशूल लगाया जाता है, और कहा जाता है कि भगवान शिव का सच्चा भक्त ही त्रिशूल को अपने स्थान से हिला सकता है। 9वीं और 11वीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र पर शासन करने वाले कत्यूरी राजाओं ने गोपीनाथ मंदिर का निर्माण किया था।

7. नीलकंठ महादेव मंदिर – Neelkanth Mahadev Temple

उत्तराखंड के प्रमुख शिव मंदिर

नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश के करीब है और यह उत्तराखंड के सबसे प्रसिद्ध शिव मंदिरों में से एक है। मंदिर की वास्तुकला उत्तराखंड के अन्य सभी शिव मंदिरों से बहुत अलग है और भारत के दक्षिणी हिस्सों में पाए जाने वाले मंदिरों से अधिक संबंधित है। शिखर और मंदिर की दीवारों पर पत्थर की नक्काशी बहुत सुंदर और जटिल तरीके से की गई है। शिव को नीलकंठ महादेव उस विष के कारण कहा जाता हैं जो भगवान शिव ने समुद्र मंथन के दौरान पिया था। मंदिर उसी स्थान पर बना है जहां भगवान शिव ने विष पीया था।

8. टपकेश्वर महादेव मंदिर – Tapkeshwar Mahadev Temple

उत्तराखंड के प्रमुख शिव मंदिर

टपकेश्वर महादेव मंदिर देहरादून के सबसे प्रसिद्ध आकर्षणों में से एक है। यह मंदिर उत्तराखंड के सबसे अच्छे शिव मंदिरों में से एक है। टपकेश्वर महादेव मंदिर एक प्राकृतिक गुफा के अंदर है, और गुफा की छत से शिवलिंग पर पानी गिरता है। इस बात की प्रसिद्ध कहानी है कि कैसे द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा ने भगवान शिव से उनके जन्म के बाद उन्हें दूध पीने के लिए प्रार्थना की। भगवान शिव अश्वत्थामा से प्रसन्न हुए और उन्हें दूध पिलाया। मंदिर के पास सल्फर के झरने हैं जहां पर्यटक आमतौर पर मंदिर में प्रवेश करने से पहले स्नान करते हैं।

9. बैजनाथ मंदिर – Baijnath Temple

उत्तराखंड के प्रमुख शिव मंदिर

बैजनाथ मंदिर उत्तराखंड के बैजनाथ में एक मंदिर नहीं बल्कि मंदिरों का एक पूरा समूह है। कई सदियों पहले कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों पर शासन करने वाले कत्यूरी राजाओं ने इन मंदिरों का निर्माण कराया था। बैजनाथ मंदिर 12वीं शताब्दी के आसपास बनाया गया था। मुख्य मंदिर एक शिव मंदिर है जो चिकित्सकों के भगवान भगवान वैद्यनाथ की भक्ति में बनाया गया है। स्थानीय लोगों के बीच यह भी प्रसिद्ध है कि भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह यहां गोमती नदी के तट पर हुआ था, जो बैजनाथ मंदिर के पास बहती है। मंदिर परिसर में कई अन्य मंदिर हैं और वे अन्य हिंदू देवी-देवताओं को समर्पित हैं।

10. बागनाथ मंदिर – Bagnath Temple

उत्तराखंड के 20 प्रमुख दर्शनीय शिव मंदिर हिंदी में

बागनाथ मंदिर उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है। यह मंदिर गोमती और सरयू नदियों के संगम पर बना है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऋषि मार्कंडेय ने इस स्थान पर भगवान शिव का ध्यान और प्रार्थना की थी। तब भगवान शिव ने उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर दिया और एक बाघ के रूप में यहां प्रकट हुए। स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि यह मंदिर सातवीं शताब्दी जितना पुराना है। बागनाथ मंदिर पौराणिक काल से प्रसिद्ध है और यहां तक ​​कि स्कंद पुराण जैसे प्राचीन हिंदू ग्रंथों में भी भगवान शिव के एक महत्वपूर्ण और पवित्र मंदिर के रूप में बागनाथ मंदिर का उल्लेख है।

11. अगस्तेश्वर महादेव मंदिर – Agasteshwar Mahadev Temple

उत्तराखंड के 20 प्रमुख दर्शनीय शिव मंदिर हिंदी में

रुद्रप्रयाग से 18 किमी की दूरी पर स्थित, अगस्तेश्वर महादेव मंदिर मंदाकिनी नदी के तट पर एक लोकप्रिय तीर्थस्थल है। एक आदर्श स्थान पर स्थित, मंदिर ध्यान करने और मानसिक शांति पाने के लिए एक लुभावनी वातावरण प्रस्तुत करता है। मंदिर को अगस्त्यमुनि मंदिर के रूप में भी जाना जाता है और ऐसा माना जाता है कि महान ऋषि अगस्त्य ने यहां कुछ वर्षों तक ध्यान किया था। हर साल बैसाखी के दौरान यहां एक भव्य मेला लगता है।

12. बिनसर महादेव मंदिर – Binsar Mahadev Temple

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समुद्र तल से 2480 मीटर की ऊंचाई पर एक मध्य ऊंचाई वाला मंदिर, बिनसर महादेव मंदिर उत्तराखंड के चमोली में घने देवदार के जंगल की प्राकृतिक महिमा से घिरा हुआ है। उत्तराखंड का विस्मयकारी हिल स्टेशन रानीखेत इस मंदिर से केवल 19 किमी दूर है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण एक ही दिन में हुआ था। वैकुंठ चतुर्दशी पर महिलाएं अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य और अपने परिवार की समृद्धि की कामना करते हुए इस मंदिर में पूजा करती हैं। मंदिरों के आसपास की साफ-सफाई और ताजी हरी पृष्ठभूमि इस मंदिर की विशिष्टता को बढाती है।

13. बूढ़ा केदार मंदिर – Budha Kedar Temple

उत्तराखंड के 20 प्रमुख दर्शनीय शिव मंदिर हिंदी में

उत्तराखंड राज्य में टिहरी गढ़वाल जिले में एक शांत और रचित स्थान, बूढ़ा केदार पवित्र मंदिर के अस्तित्व से धन्य है। मंदिर महाभारत के दिनों का है और इसका संबंध महाभारत के पांडवों से है। मंदिर नई टिहरी से लगभग 59 किमी दूर है और घने देवदार के जंगल से ढकी ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ है। बाल गंगा और धरम गंगा नदी के संगम पर खड़े होने के लिए मंदिर को अधिक महत्व मिलता है। इस मंदिर में पाया जाने वाला शिव लिंग उत्तर भारत में सबसे बड़ा माना जाता है।

14. जागेश्वर मंदिर – Jageshwar Dham Temple

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जागेश्वर एक 2500 साल पुराना मंदिर परिसर है जो अपने बाहरी हिस्से पर जटिल डिजाइनों के साथ अपनी महिमा में खड़ा है। पृष्ठभूमि में शानदार प्राकृतिक नज़ारों से घिरा यह मंदिर उन लोगों के लिए एक आदर्श स्थान हो सकता है जो मानसिक शांति की तलाश में हैं। सामान्य दिनों में मंदिर परिसर में कम भीड़ रहती है। जो लोग स्थापत्य की भव्यता का पता लगाना पसंद करते हैं, उन्हें मंदिर के संरक्षक बने विभिन्न राजवंशों के बारे में बेहतर जानकारी प्राप्त करने के लिए इस जगह को अवश्य देखना चाहिए। शिव के निवास के अलावा, परिसर में मृत्युंजय महादेव, सूर्य, चंडिका, कुबेर, नौ दुर्गा, नव ग्रह और कुछ अन्य लोकप्रिय हिंदू देवताओं को समर्पित कुछ अन्य मंदिर भी हैं।

15. कमलेश्वर महादेव मंदिर – Kamleshwar Mahadev Temple

उत्तराखंड के 20 प्रमुख दर्शनीय शिव मंदिर हिंदी में

रहस्यमय पृष्ठभूमि वाला एक छोटा मंदिर, कमलेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड के श्रीनगर, पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र में स्थित है। मंदिर कई लोकप्रिय मान्यताओं का केंद्र है, जिनमें से एक यह है कि कार्तिक चतुर्दशी के दौरान यदि कोई निःसंतान दंपति मंदिर के सामने खड़ा होता है और पूरी रात मिट्टी का दीपक पकड़े रहता है, तो उन्हें एक बच्चे का आशीर्वाद मिलता है। आचरा सप्तमी के दौरान, यानी वसंत पंचमी के दूसरे दिन, देवता को 52 प्रकार के व्यंजन चढ़ाए जाते हैं।

16. कपिलेश्वर महादेव मंदिर – Kapileshwar Mahadev Temple

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ठकौरा गांव के पास सोर घाटी में एक लोकप्रिय गुफा मंदिर, कपिलेश्वर महादेव पिथौरागढ़ जिले से 3 किमी की दूरी पर स्थित है। मंदिर के चारों ओर से घने हरे-भरे वनस्पतियों से आच्छादित ऊँची-ऊँची पर्वत श्रृंखलाएँ है। यहाँ से सोअर वैली का मनमोहक नजारा देखने लायक होता है। ऐसा माना जाता है कि ऋषि कपिला ने यहां तपस्या की थी।

17. त्रियुगीनारायण मंदिर – Triyuginarayan Temple

 Top 20 Shiva Temples in Uttarakhand in Hindi

रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण गांव में स्थित यह तीर्थ यात्रा करने के लिए एक बहुत ही पवित्र स्थान है। हालांकि यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, लेकिन यहां भगवान शिव की भी पूजा की जाती है। भक्तों की मान्यता थी कि इसी मंदिर में शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। मंदिर को अखंड धुनी मंदिर के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है कि यहां एक लौ लगातार जलती रहती है। ऐसा माना जाता है कि यह आग पिछले तीन युगों से जल रही है। मंदिर के प्रांगण में पानी का एक स्रोत (धारा) है जो आसपास के चार तालाबों को खिलाता है।

18. लाखा मंडल मंदिर – Lakha Mandal Temple

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उत्तराखंड राज्य के देहरादून जिले में एक लोकप्रिय तीर्थ स्थान, लाखा मंडल देहरादून शहर के बाहरी इलाके में लगभग 75 किमी की दूरी पर स्थित है। मंदिर की दीवारों पर कला के अद्भुत काम को दर्शाया गया है और यह कुछ छोटे और बड़े मंदिरों से घिरा हुआ है। मंदिर के आसपास अच्छी संख्या में लिंगम, मूर्तियाँ और शिलालेख पाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि कौरव भाइयों में सबसे बड़े दुर्योधन ने पांडवों को जिंदा जलाने के लिए इसी स्थान पर लक्षगृह बनाया था और मान्यता है कि मंदिर में आने वाले भक्तों को दुर्भाग्य से राहत मिलती है।

19. मुक्तेश्वर मंदिर – Mukteshwar Temple

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झेलो के शहर नैनीताल से 51 किमी दूर, मुक्तेश्वर भगवान मुक्तेश्वर महादेव की उपस्थिति से पवित्र एक शहर है। यह मंदिर उत्तराखंड राज्य में कुमाऊं की पहाड़ियों में समुद्र तल से 2286 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर का शिव लिंग विष्णु, ब्रह्मा, गणेश, नंदी और पार्वती की मूर्तियों से घिरा हुआ है। प्रसिद्ध रॉक क्लाइम्बिंग साइट चौली की जाली मंदिर के बहुत करीब स्थित है।

20. पाताल भुवनेश्वर मंदिर – Patal Bhubaneswar Temple

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पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट से 13 किमी की दूरी पर पाताल भुवनेश्वर का निवास स्थान कई रहस्यमय कथाओं और मान्यताओं से जुड़ा चूना पत्थर का गुफा मंदिर है। समुद्र तल से 1350 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस गुफा को 33 करोड़ देवताओं का आसन माना जाता है। यह रहस्यमयी गुफा मंदिर लगभग 160 मीटर लंबा और 90 फीट गहरा है। मंदिर के अंदर पाए गए कई रॉक फॉर्मेशन विभिन्न स्टैलेग्माइट आकृतियों को दर्शाते हैं। काल भैरव की जीभ, इंद्र का ऐरावत, शिव का उलझा हुआ ताला और ऐसी ही कुछ आश्चर्यजनक चीजें मंदिर के अंदर पाई जाती हैं।

केदारनाथ धाम

जानिए, क्या है केदारनाथ धाम की मान्यताएं और इतिहास – Recognitions and History of Kedarnath Dham in Hindi

केदारनाथ मंदिर के इतिहास के पीछे बहुत सारी कहानियां हैं और यह प्राचीन काल से एक तीर्थस्थल रहा है। हालांकि, इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि असली केदारनाथ मंदिर किसने और कब बनवाया था। एक पौराणिक कहानी भाइयों पांडवों द्वारा मंदिर के निर्माण का वर्णन करती है। लेकिन पवित्र महाभारत में केदारनाथ नामक किसी स्थान का उल्लेख नहीं है। केदारनाथ का सबसे पहला उल्लेख स्कंद पुराण (7वीं और 8वीं शताब्दी) में मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार, केदारनाथ वह स्थान है जहां शिव अपने उलझे हुए बालों से पवित्र गंगा को मुक्त करते हैं (जिसे हिंदी में “जटा” कहा जाता है)। 

1. केदारनाथ धाम का इतिहास – History of Kedarnath Dham

केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। केदारनाथ मंदिर उत्तरी भारत में पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है, जो समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊंचाई पर मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित है। इस क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम “केदार खंड” है। केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड में चार धाम और पंच केदार का एक हिस्सा है और भारत में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। केदारनाथ छोटा चार धाम तीर्थयात्रा के चार स्थलों में से भी एक है। भगवान शिव को समर्पित, केदारनाथ मंदिर पाडल पेट्रा स्थलम (दुनिया के सबसे शक्तिशाली शिव मंदिरों) के 275 मंदिरों में से एक है और पंच केदारों में सबसे महत्वपूर्ण भी है। 

मंदिर न केवल बर्फ के नीचे 400 सौ साल तक जीवित रहा, बल्कि ग्लेशियर की आवाजाही और अचानक आई बाढ़ से किसी भी तरह की गंभीर क्षति से बचा, लेकिन इसका प्रभाव केदारनाथ मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किए गए पत्थरों पर पीली रेखाओं के रूप में देखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मंदिर के अंदर हिमनदों की गति के कई चिन्ह हैं और पत्थर कहीं अधिक पॉलिश किए गए हैं। वे कहते हैं कि 1300-1900 ईस्वी के बीच की अवधि को लिटिल आइस एज के रूप में जाना जाता है जब पृथ्वी का एक बड़ा हिस्सा बर्फ (ग्लेशियर) से ढका हुआ था। और इस वजह से उस काल में केदारनाथ मंदिर और आसपास के स्थान बर्फ से ढके हुए थे और हिमनदों का हिस्सा बन गए थे। 

2. केदारनाथ के बारे में पांडवों की कहानी – Pandavas Story About Kedarnath

पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत के बाद पांडवों ने केदारनाथ मंदिर का निर्माण कराया था। ऐसा कहा जाता है कि पांडव अपने कौरव भाइयों को मारकर उनके पापों का प्रायश्चित करने के लिए क्षमा के लिए भगवान शिव के पास जाना चाहते थे। लेकिन भगवान शिव उनसे मिलना नहीं चाहते थे। इसलिए भगवान शिव गुप्तकाशी में छिपे थे। गुप्त काशी में पांडवों और द्रौपदी ने एक बैल देखा जो अन्य बैलों से बहुत ही अनोखा था। पांडव के भाई भीम ने पहचान लिया कि बैल कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव हैं। भगवान शिव जो उनसे छिप रहे थे, नंदी, बैल के रूप में थे। भीम ने बैल को पकड़ने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सका, उसने केवल बैल की पूंछ पकड़ी। 

यह भी पढ़ें: भारत के 14 प्राचीन,चमत्कारी और रहस्यमयी मंदिर

3. पंच केदार का इतिहास – History of Panch Kedar

 पंच केदार

गुप्तकाशी से गायब हुए भगवान शिव पांच अलग-अलग जगहों पर पांच अलग-अलग रूपों में फिर से प्रकट हुए, केदारनाथ में कूबड़, रुद्रनाथ में चेहरा, तुंगनाथ में हथियार, मध्यमहेश्वर में नाभि, और पेट कल्पेश्वर में बाल ताले (जटा)। और इस तरह पंच केदार अस्तित्व में आया। पंच केदार केदारनाथ मंदिर के इतिहास के बारे में पांडवों की कहानी का प्रमाण है। भगवान शिव उनके प्रयासों और कड़ी मेहनत से प्रभावित थे। फिर उसने आखिरकार उन्हें उनके कामों के लिए माफ कर दिया। 

4. वर्तमान केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया था? – Who built the Present Kedarnath Temple?

केदारनाथ धाम

हालांकि केदारनाथ मंदिर के इतिहास के बारे में कोई दस्तावेज प्रमाण नहीं है। और किसके द्वारा बनवाया गया था। लेकिन इसके निर्माण के बारे में कई मिथक हैं। गढ़वाल विकास निगम के अनुसार, आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया था। यानी 13वीं सदी में शुरू हुआ छोटा हिमयुग का मंदिर पहले ही बन चुका था। इसकी दीवारें मोटे पत्थरों से ढकी हुई हैं और इसकी छत एक ही पत्थर से बनी है।

5. केदारनाथ के पास पर्यटन स्थल  – Tourist Places Near Kedarnath

केदारनाथ अपने आप में एक पर्यटन स्थल है लेकिन केदारनाथ धाम के पास, कई अन्य तीर्थ और पर्यटक आकर्षण हैं, जिनमें उच्च ऊंचाई वाली झीलें और ट्रेकिंग भ्रमण शामिल हैं। केदारनाथ यात्रा के दौरान त्रियुगीनारायण, गुप्तकाशी, चोपता, देवरिया ताल, पंच केदार, चंद्रशिला, कालीमठ और अगस्त्यमुनि जैसे स्थानों की भी यात्रा की जा सकती है। त्रियुगीनारायण वह प्रसिद्ध स्थान है जहां भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था, और यह इस क्षेत्र के खिंचाव का अनुभव करने के लायक है।

चोपता और देवरिया तलारे को गढ़वाल क्षेत्र में सबसे खूबसूरत जगहों में से एक माना जाता है। यह हिमालय की पहाड़ियों का शानदार नजारा पेश करते है और आपको स्वर्ग का अहसास कराते है। केदारनाथ, मदमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर जैसे मंदिर गढ़वाल हिमालय में भगवान शिव के पांच सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों के दर्शन करने चाहिए। स्थानीय लोग इन्हें पंच केदार के नाम से जानते हैं। उत्तराखंड में पंच केदार का बहुत महत्व है।

पवित्र अनुभव के अलावा, यदि किसी को वास्तुकला में गहरी रुचि है, तो उन्हें अगस्तेश्वर महादेव मंदिर जाना चाहिए जो ऋषि अगस्त्य को समर्पित है और पुरातात्विक महत्व का भी है, यहाँ देवी-देवताओं की मूर्तियां को पत्थरों पर उकेरा गया है। इसके अलावा, अधिक अद्भुत दृश्यों के लिए केदार मासिफ पर जाएं। यह तीन प्रमुख पर्वतों केदार गुंबद, भारतेकुंठ और केदारनाथ द्वारा निर्मित एक उत्कृष्ट पुंजक है कालीमठ।  

यह भी पढ़ें: तिरुपति बालाजी मंदिर का रहस्य और उनकी कहानी

भारत के 14 प्राचीन,चमत्कारी और रहस्यमयी मंदिर – Ancient Miraculous and Mysterious Temples of India in Hindi

भारत 64 करोड़ देवी-देवताओं की भूमि है, जो अपने प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों के लिए विश्वविख्यात है। भारत देश के कोने-कोने में आपको बिभिन्न देवी-देवतायों को समर्पित मंदिर देखने को मिलते है, जो अपनी किसी ना किसी परम्परा,सिद्धि, संस्कृति, या मान्यतायों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इनके साथ-साथ भारत में कुछ ऐसे मंदिर भी है, जो अपनी रहस्यमयी और अविश्वसनिय घटनायों की बजह से चर्चा के विषय बने हुए है। भारत के प्राचीनतम मंदिरों की बनावट, विशेषता, महत्व और इतिहास आदि जानने के लिए ही पर्यटक बार-बार भारत की ओर रुख करते हैं। इनमें से कई मंदिर तो ऐसे भी हैं जो कई हजारों साल पुराने हैं और जिनके बारे में जानना पर्यटकों के लिए कौतुहल का विषय है, जो श्र्धालुयों और पर्यटकों के साथ-साथ इतिहासकारों के लिए भी एक पहेली बने हुए है।

और ये रहस्यमयी मंदिर अपनी रहस्यमयी घटनायों और अद्भुद कहानियों से कई हजारों पर्यटकों और इतिहासकारों को इन्ही रहस्यमयी घटनायों पर खोज करने के लिए अपनी और आकर्षित करते है।भारत कई रहस्यमय मंदिरों का देश है। भारत के इन रहस्यमय मंदिरों में से कुछ अपने अपरंपरागत देवताओं के कारण प्रसिद्ध हैं, कुछ उनके भूत-प्रेत संस्कार के कारण, और कुछ इसलिए क्योंकि वे 2000 वर्ष से अधिक पुराने हैं। प्राचीनकाल में जब मंदिर बनाए जाते थे तो वास्तु और खगोल विज्ञान का ध्यान रखा जाता था। इसके अलावा राजा-महाराजा अपना खजाना छुपाकर इसके ऊपर मंदिर बना देते थे और खजाने तक पहुंचने के लिए अलग से रास्ते बनाते थे।

1. वीरभद्र मंदिर, आंध्र प्रदेश

वीरभद्र मंदिर भारत के सबसे रहस्यमयी मंदिरों में से एक है। 16 वीं शताब्दीके आसपास निर्मित 16 वीं शताब्दी 70 विशाल स्तंभों का घर है जो विजयनगर शैली को दर्शाते हैं। वीरभद्र मंदिर की रहस्यमयी बात यह है की यहाँ 70 विशाल स्तंभों में से एक स्तंभ मंदिर की छत से लटका हुआ है, और वह जमीन को बिलकुल भी स्पर्श नही करता है। जिसे हैंगिंग पिलर के नाम से भी जाना जाता है। जहाँ अक्सर पर्यटक स्तंभ के निचे से एक पतला कपड़ा निकालते हुए देखे जाते है।

2. वेंकटेश्वर मंदिर, आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित, भगवान वेंकटेश्वर मंदिर को तिरुपति के रूप में जाना जाता है, जो देश के सबसे अधिक प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है। वेंकटेश्वर मंदिर तिरुपति की सात पहाड़ियों में से एक है, जहाँ मुख्य मंदिर स्थित है। माना जाता है कि यहाँ भगवान वेंकटेश्वर ने एक मूर्ति का रूप धारण किया था और इसलिए यहाँ वेंकटेश्वर मंदिर की स्थापना हुई। देवता के घर को बालाजी और गोविंदा के रूप में भी जाना जाता है। नाइयों द्वारा निर्मित, भारत के इस सबसे प्रसिद्ध रहस्यमय मंदिर में दो विशाल हॉल हैं, जो हर दिन 12,000 से अधिक तीर्थयात्रियों के बाल काटते है, जो सालाना लगभग 75 टन बाल तक पहुंचते हैं। और इन बालों को बेचकर तिरुपति मंदिर को 6.5 मिलियन अमरीकी डालर से अधिक की कमाई होती हैं।

3. काल भैरव मंदिर, उज्जैन

हालांकि इस मंदिर के बारे में सभी जानते हैं कि यहां की काल भैरव की मूर्ति मदिरापान करती है इसीलिए यहां मंदिर में प्रसाद की जगह शराब चढ़ाई जाती है। यही शराब यहां प्रसाद के रूप में भी बांटी जाती है। कहा जाता है कि काल भैरव नाथ इस शहर के रक्षक हैं। इस मंदिर के बाहर साल के 12 महीने और 24 घंटे शराब उपलब्ध रहती है। 

4. स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर, गुजरात

गुजरात में मौजूद स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर भारत के अविश्वसनीय और रहस्यमय मंदिरों में आता है। ऐसा कहा जाता है कि ये मंदिर दिन में कुछ समय के लिए पूरी तरह से गायब हो जाता है। गायब होने के बाद इस मंदिर का एक भी हिस्सा दिखाई नहीं देता। ये मंदिर गुजरात में अरब सागर और कैम्बे की खाड़ी के तट के बीच मौजूद है और हाई टाइड के दौरान ये मंदिर रोजाना पानी में डूब जाता है और हाई टाइड का स्तर नीचे जाने पर ये मंदिर फिर से ऊपर आ जाता है। ऊपर आने के बाद, फिर इस मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है। प्रकृति के इस असाधारण नजारे को देखने के लिए यहां हजारों में भीड़ जमा हो जाती है।

5. ब्रह्मा मंदिर पुष्कर, राजस्थान

ब्रह्मा मंदिर जिसे जगतपिता ब्रह्मा मंदिर भी कहा जाता है। ब्रह्मा मंदिर भारत का प्राचीन रहस्यमय मंदिर है जो भगवान ब्रह्मा को समर्पित है, जिन्हें ब्रह्मांड का निर्माता माना जाता है। यह भारत में ब्रह्मा को समर्पित एकमात्र मंदिर होने के कारण हर साल लाखों तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। माना जाता है कि ब्रह्मा मंदिर 2000 साल पुराना है, जिसे मूल रूप से 14 वीं शताब्दी में बनाया गया था। यह आदि शंकराचार्य और ऋषि विश्वामित्र द्वारा निर्मित किया गया था। संगमरमर और विशाल पत्थर की शिलाओं से निर्मित इसमें भगवान ब्रह्मा की दो पत्नियों, गायत्री और सावित्री के चित्र हैं। और इस मंदिर को संन्यासी (तपस्वी) संप्रदाय द्वारा संचालित है।

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6. शनि शिंगणापुर, महाराष्ट्

देश में सूर्यपुत्र शनिदेव के कई मंदिर हैं। उन्हीं में से एक प्रमुख है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर का शनि मंदिर। विश्वप्रसिद्ध इस शनि मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थित शनिदेव की पाषाण प्रतिमा बगैर किसी छत्र या गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजित है।

यहां शिगणापुर शहर में भगवान शनि महाराज का खौफ इतना है कि शहर के अधिकांश घरों में खिड़की, दरवाजे और तिजोरी नहीं हैं। दरवाजों की जगह यदि लगे हैं तो केवल पर्दे। ऐसा इसलिए, क्योंकि यहां चोरी नहीं होती। कहा जाता है कि जो भी चोरी करता है उसे शनि महाराज सजा स्वयं दे देते हैं। इसके कई प्रत्यक्ष उदाहरण देखे गए हैं। शनि के प्रकोप से मुक्ति के लिए यहां पर विश्वभर से प्रति शनिवार लाखों लोग आते हैं।

7. काल भैरव नाथ मंदिर, वाराणसी

काल भैरव नाथ मंदिर भारत के सबसे रहस्यमयी मंदिरों में से एक है। यह मंदिर बटुक भैरव को समर्पित है, जो भगवान शिव के अवतार थे। वाराणसी का प्रसिद्ध मंदिर काल भैरव नाथ मंदिर अघोरियों और तांत्रिकों के लिए उनका बिशेष पूजा स्थल माना जाता है। काल भैरव नाथ मंदिर की सबसे रहस्यमयी और दिलचस्प विशेषता पवित्र अखंड दीप है जो माना जाता है कि यह युगों से जल रहा है। कहा जाता है कि इस दीपक के तेल में हीलिंग पॉवर होती है।

साथ इस मंदिर की एक और दिलचस्प बात यह की यहाँ भैरव नाथ को प्रसाद के रूप में शराब चढ़ाई जाती है चाहे बस व्हिस्की, वोडका या फिर देशी शराब। काल भैरव नाथ मंदिर में शराब सीधे देवता के खुले हुए मुह में डाली जाती है और उसे बाद में भक्तो को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। और इस मंदिर के बाहर अन्य मंदिरों की तरह फूल या मिठाइयाँ नही बेचीं जाती है बल्कि इस मंदिर के बाहर के स्टाल प्रसाद के लिए केवल शराब बेचते हैं।

8. सोमनाथ मंदिर, गुजरात

सोमनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है जिसकी गिनती 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में होती है। प्राचीनकाल में इसका शिवलिंग हवा में झूलता था, लेकिन आक्रमणकारियों ने इसे तोड़ दिया। माना जाता है कि 24 शिवलिंगों की स्थापना की गई थी उसमें सोमनाथ का शिवलिंग बीचोबीच था। इन शिवलिंगों में मक्का स्थित काबा का शिवलिंग भी शामिल है। इनमें से कुछ शिवलिंग आकाश में स्थित कर्क रेखा के नीचे आते हैं।

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। इस स्थान को सबसे रहस्यमय माना जाता है। यदुवंशियों के लिए यह प्रमुख स्थान था। इस मंदिर को अब तक 17 बार नष्ट किया गया है और हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया।

यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे, तब ही शिकारी ने उनके पैर के तलुए में पद्मचिह्न को हिरण की आंख जानकर धोखे में तीर मारा था, तब ही कृष्ण ने देह त्यागकर यहीं से वैकुंठ गमन किया। इस स्थान पर बड़ा ही सुन्दर कृष्ण मंदिर बना हुआ है।

9. करणी माता मंदिर, राजस्थान

राजस्थान के देशनोक नगर में करणी माता का मंदिर मौजूद है। ये मंदिर भी किसी रहस्यमयी मंदिर से कम नहीं है। आपको जानकार हैरानी होगी कि इस मंदिर में 20,000 से अधिक चूहे है, और चूहों का झूठा भोजन बेहद पवित्र माना जाता है। भोजन को वहां प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है। ऐसा भी मान्यता है कि अगर एक चूहा मारा जाता है, तो उसकी जगह पर एक सोने का चूहा रखा जाता है। 

10. कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर, केरल

कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर या केरल में श्री कुरुम्बा भगवती मंदिर केरल के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर देवी भद्रकाली के एक प्रमुख रूप को समर्पित है। पवित्र मंदिर केरल के सबसे शक्तिशाली शक्ति पीठों में से एक है और इसे कन्नकी के अवतार के रूप में जाना जाता है। इस मंदिर का आकर्षक या रहस्यमयी पहलू यह है कि यहाँ माना जाता है कि मंदिर में होने वाली पूजा या अनुष्ठान स्वयं देवी के निर्देशों के तहत किए जाते हैं।

11. देवारागट्टू मंदिर, आंध्र प्रदेश

देवारागट्टू मंदिर दक्षिण भारत के सबसे रहस्यमय मंदिरों में से एक है। देवारागट्टू मंदिर बानी महोत्सव के लिए प्रसिद्ध है। यह त्योहार निश्चित रूप से भारत का सबसे अजीब और सबसे खूनी दशहरा उत्सव है। जहाँ कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के सैकड़ों ग्रामीण इस खतरनाक उत्सव का हिस्सा बनने के लिए कुरनूल में इकट्ठा होते हैं। जहाँ लोग उत्सव में एक दूसरे पर लाठियों से प्रहार करते है, चाहे उससे किसी का सिर फूटे या कुछ भी लेकिन उत्सव नही रोका जाता है।

और माना जाता है की कुछ 100 बर्षो पहले यह उत्सव कुल्हाड़ियों और भाले के साथ मनाया जाता था। लेकिन अब यह वर्तमान स्वरूप में सिर्फ लाठी के साथ मनाया जाता है। जबकि पूरा उत्सव दर्शकों को झकझोर कर रख देता है, यह स्थानीय लोगों का “मारने या मारने” का उत्साह है जो हमें आश्चर्यचकित करता है कि हम बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाने के लिए कितना दूर जाते हैं।

12. बालाजी मंदिर महेन्दीपुर, राजस्थान

राजस्थान राज्य के दौसा जिले में स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर भगवान हनुमान (शक्ति के देवता) को समर्पित है। कई भक्तों का मानना ​​है कि यह जगह जादुई शक्तियों से युक्त मंदिर है और इसलिए बालाजी मंदिर में हजारों श्रद्धालु काला जादू से छुटकारा पाने और राहत पाने के लिए आते हैं। भूत और बुरी आत्माओं को दूर करने के लिए यह सबसे अच्छा स्थल माना जाता है। पोराणिक कथायों के अनुसार माने तो बालाजी मंदिर से कई दिव्य शक्तियां जुड़ी है, जो बुरी आत्माओं से प्रभावित लोगों को ठीक करने की क्षमता रखती है, और उन्हें काले जादू के चंगुल से खुद को मुक्त करने में मदद करती है। 

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13. कामाख्या देवी मंदिर, असम

कामाख्या मंदिर को तांत्रिकों का गढ़ कहा गया है। माता के 51 शक्तिपीठों में से एक इस पीठ को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह असम के गुवाहाटी में स्थित है। यहां त्रिपुरासुंदरी, मतांगी और कमला की प्रतिमा मुख्य रूप से स्थापित है। दूसरी ओर 7 अन्य रूपों की प्रतिमा अलग-अलग मंदिरों में स्थापित की गई है, जो मुख्य मंदिर को घेरे हुए है।

पौराणिक मान्यता है कि साल में एक बार अम्बूवाची पर्व के दौरान मां भगवती रजस्वला होती हैं और मां भगवती की गर्भगृह स्थित महामुद्रा (योनि-तीर्थ) से निरंतर 3 दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है। इस मंदिर के चमत्कार और रहस्यों के बारे में किताबें भरी पड़ी हैं। हजारों ऐसे किस्से हैं जिससे इस मंदिर के चमत्कारिक और रहस्यमय होने का पता चलता है।

14. खजुराहो का मंदिर, मध्य प्रदेश

आखिर क्या कारण थे कि उस काल के राजा ने सेक्स को समर्पित मंदिरों की एक पूरी श्रृंखला बनवाई? यह रहस्य आज भी बरकरार है। खजुराहो वैसे तो भारत के मध्यप्रदेश प्रांत के छतरपुर जिले में स्थित एक छोटा-सा कस्बा है लेकिन फिर भी भारत में ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा देखे और घूमे जाने वाले पर्यटन स्थलों में अगर कोई दूसरा नाम आता है तो वह है खजुराहो। खजुराहो भारतीय आर्य स्थापत्य और वास्तुकला की एक नायाब मिसाल है।

चंदेल शासकों ने इन मंदिरों का निर्माण सन् 900 से 1130 ईसवीं के बीच करवाया था। इतिहास में इन मंदिरों का सबसे पहला जो उल्लेख मिलता है, वह अबू रिहान अल बरुनी (1022 ईसवीं) तथा अरब मुसाफिर इब्न बतूता का है। कला पारखी चंदेल राजाओं ने करीब 84 बेजोड़ व लाजवाब मंदिरों का निर्माण करवाया था, लेकिन उनमें से अभी तक सिर्फ 22 मंदिरों की ही खोज हो पाई है। ये मंदिर शैव, वैष्णव तथा जैन संप्रदायों से संबंधित हैं।

तिरुपति बालाजी मंदिर का रहस्य और उनकी कहानी

तिरुपति बालाजी मंदिर का रहस्य और उनकी कहानी – Mystery and Story if Tirupati Balaji Temple In Hindi

तिरुपति के तिरुमला की पहाड़ियों में स्थित तिरुपति बालाजी विश्व के सबसे प्रतिष्ठित देवी देवताओ में से एक है, जो भारत के आँध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में है। समुद्र तल से 853 फीट ऊंचाई पर स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर सात चोटियों से घिरा हुआ हुआ है जिस कारण  से तिरुपति बालाजी मंदिर को “सात पहाडिय़ों का मंदिर” भी कहा जाता है। इस प्रसिद्ध मंदिर में प्रतिदिन 50 हजार से 1 लाख भक्त वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

दान और धर्म के संदर्भ में ये देश का सबसे अमीर मंदिर है, जहाँ हर साल करोड़ों रूपय का दान किया जाता है। इस प्राचीन मंदिर से कई पौराणिक कथाएं भी जुडी है, जिन्हे जानने के लिए हर पर्यटक उत्साहित होता है। आज हम इस लेख में तिरुपति बालाजी की स्टोरी, तिरुपति बालाजी का रहस्य, मंदिर से जुडी मान्यतायों और मंदिर से जुडी खास बातों को जानते है जो श्रधालुयों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। 

1. तिरुपति बालाजी में विराजित देवता – Deity Virajit in Tirupati Balaji in Hindi

तिरुपति बालाजी मंदिर भारत का एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर है और इस मंदिर में भगवान विष्णु जी एक अवतार स्वामी “वेंकटेश्वर” विराजमान है, और इसी कारण से मंदिर को स्वामी वेंकटेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। वेंकटेश्वर को एकमात्र ऐसे भगवान के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने लोगों को कलियुग की परेशानियों से बचाने के लिए जन्म लिया था।

वह कलियुग के अंत तक मंदिर में वहीं रहेंगे। कलियुग के अंत में भगवान विष्णु के अन्य अवतार कल्कि जन्म लेंगे और पृथ्वी पर सब कुछ नष्ट कर देंगे। यह तब होगा जब पाप अपने चरम पर पहुंच जाएंगे और कोई मानवता नहीं बचेगी। वह कलियुग का अंत होगा और कल्कि सब कुछ नष्ट कर देंगे और नए युग का निर्माण होगा। इसी कारण तिरुपति बालाजी मंदिर को कलियुग का वैकुंठ भी कहा जाता है। कलियुग प्रत्यक्ष दैवम के नाम से भी जाना जाता है। 

2. तिरुपति बालाजी की कहानी – Tirupati Balaji Story in Hindi

तिरुपति बालाजी मंदिर को लेकर दो कथाएं प्रसिद्ध हैं। वेंकटचल महात्यम् और वराह पुराण। इन दो कहानियों से पता चलता है कि तिरुमाला की भूमि भगवान विष्णु के अवतार द्वारा व्याप्त थी। 

2.1 महान आदि वराह – Adi Varaha Avatar Story in Hindi

एक बार की बात है धरती माता पाताल लोक में डूब गई क्योंकि पवन देव (वायु देव) ने भारी आग को रोकने के लिए उग्र रूप से उड़ान भरी। इससे बारिश हुई और भारी बादल छा गए और धरती पाता लोक में डूब गई। तब भगवान विष्णु ने धरती माता को बचाने का फैसला किया और आदि वराह (एक जंगली सूअर) का अवतार लिया। आदि वराह ने पाताल लोक से पृथ्वी को वापस खींचने के लिए अपने दांतों का इस्तेमाल किया।

इस घटना के बाद आदि वराह ने लोगों के कल्याण के लिए पृथ्वी पर रहने का फैसला किया। उन्होंने अपने विमान गरुड़ को वैकुंठ से कृदचल लाने के लिए कहा, जो ऊंची चोटियों वाली एक पहाड़ी श्रृंखला है। कृदचल को रत्नों से सजाया गया था और वह आदि शेष (भगवान विष्णु के सर्प रूप) के सात सिरों जैसा था। भगवान ब्रम्हा के अनुरोध के अनुसार, आदि वराह ने एक रचना की और अपनी पत्नी (4 हाथों वाली भूदेवी) के साथ कृदचल विमान पर निवास किया और ध्यान योग और कर्म योग जैसे लोगों को ज्ञान और वरदान देने का फैसला किया। 

2.2 महालक्ष्मी और तिरुपति बालाजी से जुडी कहानी – Mahalaxmi And Tirupati Balaji Story In Hindi

कलियुग की शुरुआत में भगवान आदि वराह वेंकटाद्री को छोड़कर अपने स्थायी निवास वैकुंठ चले गए। भगवान ब्रम्हा ने नारद से कुछ करने के लिए कहा, क्योंकि भगवान ब्रह्मा पृथ्वी पर भगवान विष्णु का अवतार चाहते थे। नारद गंगा नदी के तट पर गए, जहां ऋषियों का समूह भ्रमित था और यह तय नहीं कर पा रहा था कि उनके यज्ञ का फल किसे मिलेगा। वे तीन मुख्य भगवान, ब्रम्हा, भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच भ्रमित थे।

नारद ने ऋषि भृगु को तीनों सर्वोच्च देवताओं का परीक्षण करने का एक विचार दिया। ऋषि भृगु ने प्रत्येक भगवान के पास जाकर उनकी परीक्षा लेने का फैसला किया। लेकिन जब वह भगवान ब्रम्हा और भगवान शिव के पास गया तो उन दोनों ने ऋषि भृगु को नहीं देखा जिससे ऋषि भृगु क्रोधित हो गए।

अंत में वह भगवान विष्णु के पास गया और उसने भी ऋषि भृगु को नहीं देखा, इससे ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु की छाती पर लात मारी। क्रोधित होने के बावजूद भगवान विष्णु ने ऋषि के पैर की मालिश की और पूछा कि उन्हें चोट लगी है या नहीं। इसने ऋषि भृगु को उत्तर दिया और उन्होंने निश्चय किया कि यज्ञ का फल हमेशा भगवान विष्णु को समर्पित रहेगा। 

लेकिन भगवान विष्णु की छाती पर लात मारने की इस घटना ने माता लक्ष्मी को क्रोधित कर दिया, वह चाहती थीं कि भगवान विष्णु ऋषि भृगु को दंड दें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप उसने वैकुंठ को छोड़ दिया और तपस्या करने के लिए पृथ्वी पर आई और करवीरापुर (जिसे अब महाराष्ट्र में कोल्हापुर के नाम से जाना जाता है) में ध्यान करना शुरू कर दिया। 

2.3 स्वामी वेंकटेश्वर भगवान के धरती पर अवतरित होने से जुड़ी कहानी – Story Related to Swami Venkateswara’s Incarnation on Earth in Hindi

इस घटना से प्रभावित होकर भगवान विष्णु वैकुंठ में बहुत दुखी हो गए और एक दिन माता लक्ष्मी की तलाश में वैकुंठ छोड़ कर विभिन्न जंगलों और पहाड़ियों में भटक गए। लेकिन उन्हें माता लक्ष्मी नहीं मिली। भगवान विष्णु एक चींटी की पहाड़ी में अपने आश्रय के रूप में रहने लगे और यह चींटी पहाड़ी वेंकटाद्री में थी। 

भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा ने भगवान विष्णु की मदद करने का फैसला किया। इसलिए वे एक गाय और एक बछड़े में परिवर्तित हो गए और माता लक्ष्मी के पास गए। भगवान सूर्य ने माता लक्ष्मी को परिदृश्य के बारे में बताया और उन्हें गाय और बछड़ा चोल राजाओं को देने के लिए कहा। चोल राजा ने अपने मवेशियों को चरने के लिए वेंकटाद्री पर्वत पर भेजा। गाय चींटी की पहाड़ी पर अपना थन खाली करने लगी और भगवान विष्णु को खिलाने लगी। लेकिन एक दिन गाय को चरवाहे ने देख लिया।

उसने क्रोध से गाय को मारने के लिए अपनी कुल्हाड़ी फेंक दी और भगवान विष्णु ने उस पर हमला करके गाय को बचा लिया और उसे चोट लगी। जब चरवाहे ने देखा कि भगवान विष्णु का खून बह रहा है तो उसकी मौके पर ही मौत हो गई। चोल राजा को भी विष्णु ने अपने सेवक द्वारा किए गए पाप के कारण दानव बनने का श्राप दिया था। राजा ने दया और निर्दोषता की याचना की। तब भगवान विष्णु ने उससे कहा कि वह अपने अगले जन्म में आकाश राजा के रूप में पैदा होगा और जब विष्णु के पद्मावती के साथ विवाह के दौरान विष्णु को आकाश राजा से मुकुट भेंट किया जाएगा तो शाप समाप्त हो जाएगा। 

भगवान विष्णु ने खुद को श्रीनिवास के रूप में अवतार लिया और वेंकटाद्री पर्वत पर रहते थे और उनकी माता वकुला देवी द्वारा उनकी देखभाल की जाती थी। कुछ समय बाद आकाश राजा का भी जन्म हुआ लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। एक दिन खेत जोतते समय उन्हें कमल के फूल पर एक बच्ची मिली, उन्होंने उसका नाम पद्मावती रखा। एक दिन श्रीनिवास शिकार की होड़ में थे और एक हाथी का पीछा कर रहे थे। लेकिन हाथी एक बगीचे में पहुँच गया जहाँ पद्मावती अपने दोस्तों के साथ खेल रही थी।

हाथी ने सभी को धमकाया; श्रीनिवास ने वहां बगीचे में सभी को बचाया। श्रीनिवास पद्मावती की सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो गए और उनके बारे में भी पूछा। उसने अपनी मां वकुला देवी से कहा कि वह पद्मावती से शादी करना चाहता है। यह भी पता चला कि वह भगवान विष्णु हैं और वकुला देवी अपने पिछले जन्म में माता यशोदा (कृष्ण की मां) थीं। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक वह पद्मावती से शादी नहीं कर लेते, तब तक उन्हें शांत नहीं किया जाएगा। वकुला देवी विवाह का प्रस्ताव लेकर राजा अकासा राजा के पास गई।

रास्ते में वकुला देवी ने भी पाया कि पद्मावती भी अपनी दासियों के माध्यम से श्रीनिवास से प्यार करती थी और प्यार के कारण बीमार पड़ गई। जब आकाश राजा को इस बात का पता चला तो उन्होंने इस विवाह के लिए ऋषि बृहस्पति से सलाह ली। बृहस्पति ने बताया कि पद्मावती का जन्म इसी जन्म में भगवान विष्णु से विवाह करने के लिए हुआ था। सभी बहुत खुश हुए और शादी तय हो गई। श्रीनिवास ने दो खगोलीय पिंडों के भव्य विवाह समारोह का आयोजन करने के लिए कुबेर (धन के भगवान) से भी पैसे उधार लिए। यह ऋण इतना बड़ा था कि उस ऋण का कर्ज भगवान वेंकटेश्वर के सभी भक्तों द्वारा मंदिर में भगवान को धन, जवाहरात, आभूषण आदि दान करके चुकाया जाता है।

मान्यता है कि कलियुगलोद_कुबेर के अंत तक यह ऋण पूरा हो जाएगा जब महा लक्ष्मी (जो कोल्हापुर में तपस्या कर रही थीं) को भगवान विष्णु के पुनर्विवाह के बारे में पता चला, तो उन्होंने अविश्वास के रूप में उनका सामना करने का फैसला किया। जब श्रीनिवास ने महालक्ष्मी और पद्मावती का एक साथ एक स्थान पर सामना किया (दोनों उनकी पत्नी थीं), तो उन्होंने खुद को एक ग्रेनाइट रॉक मूर्ति (भगवान वेंकटेश्वर) में परिवर्तित कर दिया। तब भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा ने आकर समझाया कि कलियुग में लोगों के कल्याण और मुक्ति के कारण भगवान विष्णु ने यह सब लीला की थी। यह जानने के बाद कि लक्ष्मी और पद्मावती ने भी भगवान वेंकटेश्वर के साथ वहीं रहने का फैसला किया। माता लक्ष्मी भगवान विष्णु की बायीं छाती पर और पद्मावती दायीं छाती पर रहीं। 

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3. तिरुपति बालाजी में बाल दान करने की कहानी – Tirupati Balaji Hair Donation Story In Hindi

भारत में शायद ही कोई मंदिर हो जहां भक्तों के बाल दान करने की परंपरा हो, लेकिन तिरुपति बालाजी मंदिर में बाल चढ़ाने की यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसे “मोक्कू” कहा जाता है। जानकर हैरानी होगी, लेकिन एक आंकड़े के मुताबिक हर साल 20 हजार लोग अपने बाल दान करते हैं। तिरुपति बालाजी में बाल दान करने की परंपरा काफी पुरानी है। हिंदू मान्यता के अनुसार इस दान को देने का कारण यह बताया जाता है कि भगवान वेंकटेश्वर कुबेर से लिया गया कर्ज चुकाते  हैं।

जिससे एक बेहद रोचक पौराणिक कथा जुडी हुई है, माना जाता है जब देवी लक्ष्मी ने पद्मावती और भगवान विष्णु ने वेंकटेश्वर रूप में अवतार लिया था तब  भगवान वेंकटेश्वर ने पद्मावती के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। तब एक परंपरा के अनुसार वर को शादी से पहले कन्या के परिवार को एक तरह का शुल्क देना होता था, लेकिन भगवान वेंकटेश्वर ये शुल्क देने में असमर्थ थे, इसलिए उन्होंने धन के देवता कुबेर से कर्ज लेकर पद्मावती रूपी देवी लक्ष्मी से विवाह किया और वचन दिया कि कलयुग के अंत तक वे कुबेर को सारा कर्ज चुका देंगे।

उन्होंने देवी लक्ष्मी की ओर से भी वचन देते हुए कहा कि जो भी भक्त उनका कर्ज लौटाने में उनकी मदद करेंगे देवी लक्ष्मी उन्हें उसका दस गुना ज्यादा धन देंगी। अच्छी बात यह है कि यहां भक्त अपनी मर्जी से बाल दान करते हैं। इस कार्य को पूरी परंपरा के साथ अंजाम देने के लिए यहां छह सौ नाइयों की भर्ती की गई है। दान किए गए ये बाल विदेशों में अच्छे दामों पर बेचे जाते हैं। चूंकि भारतीय बालों की गुणवत्ता बहुत अच्छी होती है, इसलिए विदेशों में इसे खूब सराहा जाता है।

4. तिरुपति बालाजी से जुड़े रोचक तथ्य – Facts About Tirupati Temple In Hindi

तिरुपति बालाजी मंदिर का रहस्य और उनकी कहानी
  • तिरुपति बालाजी मंदिर में स्थित देवताओं की पूजा के लिए फूल, घी, दूध, छाछ, पवित्र पत्ते आदि तिरुपति से लगभग बाईस किलोमीटर दूर स्थित एक अज्ञात गांव से मंगवाए जाते हैं। इस छोटे से गाँव को अपने ही लोगों के अलावा किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं देखा है।
  • स्थापित भगवान तिरुपति बालाजी की मूर्ति गर्भगृह के केंद्र में खड़ी प्रतीत हो सकती है, लेकिन तकनीकी रूप से ऐसा नहीं है। मूर्ति को वास्तव में मंदिर के दाहिने कोने में रखा गया है। 
  • भगवान बालाजी द्वारा पहने गए बाल रेशमी, चिकने, उलझे हुए और बिल्कुल असली हैं। उन दोषरहित तालों के पीछे की कहानी इस प्रकार है – भगवान बालाजी ने पृथ्वी पर अपने शासन के दौरान एक अप्रत्याशित दुर्घटना में अपने कुछ बाल खो दिए थे। नीला देवी नाम की एक गंधर्व राजकुमारी ने तुरंत इस घटना पर ध्यान दिया, और अपने गौरवशाली अयाल के एक हिस्से को काट दिया। उसने अपने कटे हुए लटों को विनम्रतापूर्वक देवता को अर्पित किया और उनसे उनके सिर पर लगाने का अनुरोध किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान ने इस तरह की भेंट स्वीकार कर ली और वादा किया कि जो कोई भी उनके मंदिर में जाएगा और उसके चरणों में अपने बालों की बलि देगा, वह धन्य होगा। तब से, भक्तों के बीच यह प्रथा रही है कि वे अपनी मनोकामना पूरी होने से पहले या बाद में मंदिर में अपना सिर मुंडवा लेते हैं। 
  • सुनने में भले ही आप यकीन नहीं करना चाहें, लेकिन सच्चाई यह है कि अगर कोई मंदिर में स्थित देवता की छवि के पीछे अपना कान लगाता है, तो समुद्र की विशाल लहरों की आवाज सुनी जा सकती है।
  • भगवान के लिए एक उत्साही भक्त के हृदय की ज्योति कभी बुझती नहीं है, उसी तरह तिरुपति बालाजी मंदिर के गर्भगृह में देवता की मूर्ति के सामने रखे मिट्टी के दीपक भी कभी नहीं बुझते हैं। उस समय के बारे में कोई विश्वसनीय रिकॉर्ड नहीं है जब ये दीपक जलाए गए थे और उन्हें किसने जलाया था। बस इतना ही पता है कि वे बहुत पहले से जल रहे हैं और आगे भी जलते  रहेंगे।
  • ऐसा मन जाता है कि, बहुत पहले जब , 19वीं शताब्दी में भारत, क्षेत्र के राजा ने एक जघन्य अपराध करने के लिए बारह लोगों को मौत की सजा दी थी। उन बारहों को मृत्यु तक उनके गले से लटकाया गया। मृत्यु के बाद, मृतक अपराधियों के शव बालाजी के मंदिर की दीवारों पर लटका दिए  थे। उसी समय देवता स्वयं प्रकट हुए।

5. तिरुपति बालाजी जाने का सबसे अच्छा समय -Best Time to Visit Tirupati Balaji in Hindi 

वैसे तो आप साल के किसी भी समय तिरुपति बालाजी के दर्शन कर सकते हैं, फिर भी जनवरी और फरवरी का मौसम तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। दरअसल, इस क्षेत्र में मार्च से सितंबर तक उमस भरी गर्मी रहती है। गर्मी के दिनों में यहां का तापमान 42 डिग्री तक पहुंच जाता है। कहा जाता है कि मंदिर 24 घंटे खुला रहता है। मंदिर सुबह 2:30 बजे से अगले दिन दोपहर 1:30 बजे तक खुला रहता है।

तिरुपति में मुफ्त दर्शन, जिसे सर्वदर्शनम कहा जाता है, कितना समय लगेगा, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। क्योंकि, अगर मंदिर में भीड़ नहीं है, तो 3 से 4 घंटे में दर्शन हो जाते हैं, लेकिन अगर दर्शन के लिए लंबी लाइन है, तो आपको कम से कम 18 घंटे लाइन में खड़ा होना पड़ सकता है। वीआईपी दर्शन के लिए आपको 300 रुपये देकर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना होगा, इसके बिना आप वीआईपी दर्शन नहीं कर सकते। वीआईपी दर्शन में आप 2 से 3 घंटे में तिरुपति के दर्शन कर सकते हैं। 

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